श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 37: श्रीराम आदि का वल्कल-वस्त्र-धारण, गुरु वसिष्ठ का कैकेयी को फटकारते हुए सीता के वल्कलधारण का अनौचित्य बताना  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  2.37.6 
अथ चीराणि कैकेयी स्वयमाहृत्य राघवम्।
उवाच परिधत्स्वेति जनौघे निरपत्रपा॥ ६॥
 
 
अनुवाद
कैकेयी ने सारी लज्जा और संकोच त्याग दिया था। वह स्वयं जाकर बहुत-से कपड़े ले आईं और भीड़ के सामने श्री रामचन्द्र से बोलीं, 'लो, पहन लो।'
 
Kaikeyi had left all shyness and hesitation behind. She herself went and brought many pieces of cloth and said to Shri Ramchandra in front of the crowd, 'Take it, wear it'.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas