श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 37: श्रीराम आदि का वल्कल-वस्त्र-धारण, गुरु वसिष्ठ का कैकेयी को फटकारते हुए सीता के वल्कलधारण का अनौचित्य बताना  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  2.37.32 
तत् त्वया पुत्रगर्धिन्या पुत्रस्य कृतमप्रियम्।
लोके नहि स विद्येत यो न राममनुव्रत:॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
'अपने पुत्र को प्रसन्न करने की इच्छा से तुमने उस पर कोई उपकार नहीं किया; क्योंकि इस संसार में ऐसा कोई मनुष्य नहीं है जो श्री राम का भक्त न हो॥ 32॥
 
'In the desire to please your son you have in fact done him no favours; for there is no man in this world who is not a devotee of Shri Ram.॥ 32॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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