श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 37: श्रीराम आदि का वल्कल-वस्त्र-धारण, गुरु वसिष्ठ का कैकेयी को फटकारते हुए सीता के वल्कलधारण का अनौचित्य बताना  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  2.37.3 
यो हि दत्त्वा द्विपश्रेष्ठं कक्ष्यायां कुरुते मन:।
रज्जुस्नेहेन किं तस्य त्यजत: कुञ्जरोत्तमम्॥ ३॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य महान हाथी का दान करके उसकी रस्सी में मन लगाता है और लोभ के कारण उसे रखना चाहता है, वह अच्छा नहीं करता; क्योंकि जिसने महान हाथी को त्याग दिया है, उसे रस्सी में आसक्ति रखने की क्या आवश्यकता है?॥3॥
 
'He who, after donating a great elephant, fixes his mind on its rope, and out of greed wants to keep the rope, is not doing well; for what is the need for a man who has given up a great elephant to have attachment to its rope?॥ 3॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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