श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 37: श्रीराम आदि का वल्कल-वस्त्र-धारण, गुरु वसिष्ठ का कैकेयी को फटकारते हुए सीता के वल्कलधारण का अनौचित्य बताना  »  श्लोक 25-26
 
 
श्लोक  2.37.25-26 
अथ यास्यति वैदेही वनं रामेण संगता।
वयमत्रानुयास्याम: पुरं चेदं गमिष्यति॥ २५॥
अन्तपालाश्च यास्यन्ति सदारो यत्र राघव:।
सहोपजीव्यं राष्ट्रं च पुरं च सपरिच्छदम्॥ २६॥
 
 
अनुवाद
'यदि विदेहनन्दिनी सीता श्री राम के साथ वन में जाएँगी, तो हम लोग भी उनके साथ चलेंगे। यह सारा नगर भी जाएगा और भीतरी महल के रक्षक भी जाएँगे। जहाँ श्री रामचंद्रजी अपनी पत्नी सहित रहेंगे, वहाँ इस राज्य और नगर के लोग भी अपने धन और आवश्यक वस्तुओं के साथ वहाँ जाएँगे।'
 
‘If Videhanandini Sita goes to the forest with Shri Ram, then we will also go with them. This entire city will also go and the guards of the inner palace will also go. Wherever Shri Ramchandraji will stay with his wife, the people of this kingdom and city will also go there with their wealth and necessary goods.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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