श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 37: श्रीराम आदि का वल्कल-वस्त्र-धारण, गुरु वसिष्ठ का कैकेयी को फटकारते हुए सीता के वल्कलधारण का अनौचित्य बताना  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  2.37.23 
न गन्तव्यं वनं देव्या सीतया शीलवर्जिते।
अनुष्ठास्यति रामस्य सीता प्रकृतमासनम्॥ २३॥
 
 
अनुवाद
हे दुष्टा, तूने अपना शील त्याग दिया है! देवी सीता वन में नहीं जाएँगी। वह राम को अर्पित सिंहासन पर बैठेंगी॥ 23॥
 
‘You wicked woman who has given up her modesty! Goddess Sita will not go to the forest. She will sit on the throne offered to Rama.॥ 23॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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