श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 37: श्रीराम आदि का वल्कल-वस्त्र-धारण, गुरु वसिष्ठ का कैकेयी को फटकारते हुए सीता के वल्कलधारण का अनौचित्य बताना  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  2.37.22 
अतिप्रवृत्ते दुर्मेधे कैकेयि कुलपांसनि।
वञ्चयित्वा तु राजानं न प्रमाणेऽवतिष्ठसि॥ २२॥
 
 
अनुवाद
'हे मूर्ख, मर्यादाओं का उल्लंघन करके अधर्म की ओर अग्रसर होने वाली कैकेयी! तुम केकयराज के कुल पर जीवित कलंक हो। अरे! राजा को धोखा देकर क्या तुम मर्यादा में नहीं रहना चाहतीं?' 22॥
 
'Kaikayi, the foolish person who violates all limits and moves towards unrighteousness! You are a living stain on Kekayraj's clan. Hey! Don't you want to stay within the limits after deceiving the king? 22॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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