श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 37: श्रीराम आदि का वल्कल-वस्त्र-धारण, गुरु वसिष्ठ का कैकेयी को फटकारते हुए सीता के वल्कलधारण का अनौचित्य बताना  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  2.37.19 
कुरु नो याचनां पुत्र सीता तिष्ठतु भामिनी।
धर्मनित्य: स्वयं स्थातुं न हीदानीं त्वमिच्छसि॥ १९॥
 
 
अनुवाद
'पुत्र! हमारी प्रार्थना पूरी करो। भामिनी सीता यहीं रहें। तुम सदैव धर्म परायण रहते हो, इसलिए तुम स्वयं इस समय यहाँ नहीं रहना चाहते (किन्तु सीता को रहने दो)॥19॥
 
'Son! Please fulfill our request. Bhaamini Sita should stay here. You are always devoted to religion, therefore you yourself do not wish to stay here at this time (but let Sita stay)'॥ 19॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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