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श्लोक 2.37.18  |
लक्ष्मणेन सहायेन वनं गच्छस्व पुत्रक।
नेयमर्हति कल्याणि वस्तुं तापसवद् वने॥ १८॥ |
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| अनुवाद |
| 'पुत्र! लक्ष्मण को अपना सखा बनाकर उनके साथ वन में जाओ। किन्तु यह शुभ सीता तपस्वी ऋषि की भाँति वन में रहने के योग्य नहीं है।॥18॥ |
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| 'Son, take Lakshman as your companion and go with him to the forest. But this auspicious Sita is not fit to live in the forest like an ascetic sage.॥ 18॥ |
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