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श्लोक 2.36.32  |
एतद्वचो नेच्छसि पापरूपे
हितं न जानासि ममात्मनोऽथवा।
आस्थाय मार्गं कृपणं कुचेष्टा
चेष्टा हि ते साधुपथादपेता॥ ३२॥ |
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| अनुवाद |
| पापी! क्या तुम्हें यह अच्छा नहीं लगता? क्या तुम्हें मेरे या अपने कल्याण का कुछ भी ज्ञान नहीं है? तुम दुःखदायी मार्ग का आश्रय लेकर ऐसा पाप कर रहे हो। तुम्हारे सारे प्रयास पुण्यमार्ग के विपरीत हैं॥ 32॥ |
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| ‘Sinner! Do you not like this? Do you have no knowledge of my or your own welfare? You are doing such evil by resorting to a painful path. All your efforts are contrary to the path of the virtuous.॥ 32॥ |
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