श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 36: दशरथ का श्रीराम के साथ सेना और खजाना भेजने का आदेश, कैकेयी द्वारा इसका विरोध, राजा का श्रीराम के साथ जाने की इच्छा प्रकट करना  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  2.36.29 
अदुष्टस्य हि संत्याग: सत्पथे निरतस्य च।
निर्दहेदपि शक्रस्य द्युतिं धर्मविरोधवान्॥ २९॥
 
 
अनुवाद
'जिस पुरुष में कोई दुर्गुण नहीं है और जो सदैव सन्मार्ग पर स्थित रहता है, उसका त्याग धर्म के विरुद्ध माना जाता है। ऐसा धर्म-विरुद्ध कार्य इन्द्र के तेज को भी जला देता है।॥29॥
 
‘The renunciation of a person who has no evil in him and who is always established in the right path is considered against Dharma. Such an act against Dharma will burn the glory of even Indra.॥ 29॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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