श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 36: दशरथ का श्रीराम के साथ सेना और खजाना भेजने का आदेश, कैकेयी द्वारा इसका विरोध, राजा का श्रीराम के साथ जाने की इच्छा प्रकट करना  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  2.36.27 
नहि कंचन पश्यामो राघवस्यागुणं वयम्।
दुर्लभो ह्यस्य निरय: शशाङ्कस्येव कल्मषम्॥ २७॥
 
 
अनुवाद
हम श्री रामचन्द्रजी में कोई दोष नहीं देखते; जैसे (शुक्ल पक्ष की द्वितीया के) चन्द्रमा में अशुद्धि देखना दुर्लभ है, वैसे ही उनमें कोई पाप या अपराध ढूँढ़ने पर भी नहीं पाया जाता॥ 27॥
 
We do not see any flaws in Shri Ramachandraji; just as it is rare to see impurity in the moon (on the second day of the bright fortnight), similarly, no sin or crime can be found in him even if one searches for it.॥ 27॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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