श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 35: सुमन्त्र के समझाने और फटकारने पर भी कैकेयी का टस-से-मस न होना  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  2.35.4 
वाक्यवज्रैरनुपमैर्निर्भिन्दन्निव चाशुभै:।
कैकेय्या: सर्वमर्माणि सुमन्त्र: प्रत्यभाषत॥ ४॥
 
 
अनुवाद
सुमन्तराम ने अपने अशुभ और अनोखे वचनों के वज्र से कैकेयी के सम्पूर्ण प्राणों को छेदकर उससे इस प्रकार कहना आरम्भ किया-॥4॥
 
Piercing all the vital spots of Kaikeyi with the thunderbolt of his inauspicious and unique words, Sumantram began speaking to her thus -॥4॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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