श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 35: सुमन्त्र के समझाने और फटकारने पर भी कैकेयी का टस-से-मस न होना  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  2.35.32 
ज्येष्ठो वदान्य: कर्मण्य: स्वधर्मस्यापि रक्षिता।
रक्षिता जीवलोकस्य बली रामोऽभिषिच्यताम्॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
श्री रामचन्द्रजी अपने भाइयों में ज्येष्ठ, दानी, परिश्रमी, स्वधर्मपालक, चराचर जगत के रक्षक और बलवान हैं। इस राज्य पर उनका अभिषेक हो॥32॥
 
'Shri Ramchandraji is the eldest among his brothers, generous, hard-working, guardian of his own religion, protector of the living world and strong. Let him be anointed on this kingdom. 32॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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