श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 35: सुमन्त्र के समझाने और फटकारने पर भी कैकेयी का टस-से-मस न होना  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  2.35.30 
मा त्वं प्रोत्साहिता पापैर्देवराजसमप्रभम्।
भर्तारं लोकभर्तारमसद्धर्ममुपादध॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
पाप-विचार वाले मनुष्यों के बहकावे में न आ और अपने प्रभु को, जो देवराज इन्द्र के समान तेजस्वी हैं और जो जगत् की रक्षा करते हैं, अनुचित कार्यों में न लगा॥30॥
 
‘Do not get misled by people having sinful thoughts and engage your Lord, who is as illustrious as the King of Gods Indra and who protects the world, in improper activities.॥ 30॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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