श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 35: सुमन्त्र के समझाने और फटकारने पर भी कैकेयी का टस-से-मस न होना  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  2.35.28 
सत्यश्चात्र प्रवादोऽयं लौकिक: प्रतिभाति मा।
पितॄन् समनुजायन्ते नरा मातरमङ्गना:॥ २८॥
 
 
अनुवाद
‘आज मुझे यह कहावत बिल्कुल सत्य प्रतीत हो रही है कि पुत्र अपने पिता के समान होते हैं और पुत्रियाँ अपनी माता के समान होती हैं।॥28॥
 
‘Today I find the proverb that sons are like their fathers and daughters are like their mothers to be absolutely true.॥ 28॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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