श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 35: सुमन्त्र के समझाने और फटकारने पर भी कैकेयी का टस-से-मस न होना  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  2.35.27 
तथा त्वमपि राजानं दुर्जनाचरिते पथि।
असद्‍ग्राहमिमं मोहात् कुरुषे पापदर्शिनी॥ २७॥
 
 
अनुवाद
‘तुम भी दुष्टों के मार्ग पर हो और पाप पर दृष्टि लगाए हुए, आसक्ति के कारण राजा से यह अनुचित प्रार्थना कर रहे हो॥27॥
 
‘You too are on the path of the wicked and with your eyes set on sin, out of attachment you are making this unreasonable request to the king.॥ 27॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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