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श्लोक 2.35.25  |
तत: स वरद: साधू राजानं प्रत्यभाषत।
म्रियतां ध्वंसतां वेयं मा शंसीस्त्वं महीपते॥ २५॥ |
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| अनुवाद |
| तब वरदान देने वाले ऋषि ने राजा से कहा- महाराज! रानी चाहे मर जाए या घर छोड़कर चली जाए, यह बात आप उसे कभी न बताना। |
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| ‘Then the sage who had given the boon replied to the king- ‘Maharaj! Whether the queen dies or leaves the house, you should never tell this to her.’ |
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