श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 35: सुमन्त्र के समझाने और फटकारने पर भी कैकेयी का टस-से-मस न होना  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  2.35.25 
तत: स वरद: साधू राजानं प्रत्यभाषत।
म्रियतां ध्वंसतां वेयं मा शंसीस्त्वं महीपते॥ २५॥
 
 
अनुवाद
तब वरदान देने वाले ऋषि ने राजा से कहा- महाराज! रानी चाहे मर जाए या घर छोड़कर चली जाए, यह बात आप उसे कभी न बताना।
 
‘Then the sage who had given the boon replied to the king- ‘Maharaj! Whether the queen dies or leaves the house, you should never tell this to her.’
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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