श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 35: सुमन्त्र के समझाने और फटकारने पर भी कैकेयी का टस-से-मस न होना  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  2.35.18 
तव मातुरसद्‍ग्राहं विद्म पूर्वं यथा श्रुतम्।
पितुस्ते वरद: कश्चिद् ददौ वरमनुत्तमम्॥ १८॥
 
 
अनुवाद
'तुम्हारी माता का हठ हमें भी ज्ञात है। जो कुछ पहले सुना है, वही बताया जा रहा है। एक बार एक वरदाता ऋषि ने तुम्हारे पिता को बहुत अच्छा वरदान दिया था॥18॥
 
‘We are also aware of your mother's obstinacy. It is being told what has been heard about it earlier. Once a sage who gave boons had given a very good boon to your father.॥ 18॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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