श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 34: सीता और लक्ष्मण सहित श्रीराम का रानियों सहित राजा दशरथ के पास जाकर वनवास के लिये विदा माँगना, राजा का शोक और मूर्छा  »  श्लोक 59
 
 
श्लोक  2.34.59 
फलानि मूलानि च भक्षयन् वने
गिरींश्च पश्यन् सरित: सरांसि च।
वनं प्रविश्यैव विचित्रपादपं
सुखी भविष्यामि तवास्तु निर्वृति:॥ ५९॥
 
 
अनुवाद
मैं विचित्र वृक्षों से भरे हुए वन में प्रवेश करूँगा, कंद-मूल और फल खाऊँगा तथा उसके पर्वतों, नदियों और सरोवरों को देखकर प्रसन्न होऊँगा; अतः आप अपना मन शान्त कीजिए। ॥59॥
 
"I shall enter a forest full of strange trees, eat roots and fruits, and be happy by looking at its mountains, rivers and lakes; therefore, please calm your mind." ॥ 59॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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