श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 34: सीता और लक्ष्मण सहित श्रीराम का रानियों सहित राजा दशरथ के पास जाकर वनवास के लिये विदा माँगना, राजा का शोक और मूर्छा  »  श्लोक 58
 
 
श्लोक  2.34.58 
तदद्य नैवानघ राज्यमव्ययं
न सर्वकामान् वसुधां न मैथिलीम्।
न चिन्तितं त्वामनृतेन योजयन्
वृणीय सत्यं व्रतमस्तु ते तथा॥ ५८॥
 
 
अनुवाद
'निष्पाप राजा! आज मैं आपको झूठा ठहराकर चिरस्थायी राज्य, सब प्रकार के सुख, पृथ्वी का शासन, मिथिला की कन्या सीता तथा अन्य कोई भी इच्छित वस्तु स्वीकार नहीं कर सकता। मेरी तो केवल यही इच्छा है कि आपका वचन सत्य हो।'॥58॥
 
‘Innocent King! Today, by making you a liar, I cannot accept the everlasting kingdom, all kinds of pleasures, the rule of the earth, the daughter of Mithila, Sita and any other desired object. My only wish is that your promise should come true.'॥ 58॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas