श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 34: सीता और लक्ष्मण सहित श्रीराम का रानियों सहित राजा दशरथ के पास जाकर वनवास के लिये विदा माँगना, राजा का शोक और मूर्छा  »  श्लोक 57
 
 
श्लोक  2.34.57 
न मे तथा पार्थिव धीयते मनो
महत्सु कामेषु न चात्मन: प्रिये।
यथा निदेशे तव शिष्टसम्मते
व्यपैतु दु:खं तव मत्कृतेऽनघ॥ ५७॥
 
 
अनुवाद
हे पृथ्वीपति! हे निष्पाप महाराज! जिस प्रकार मेरा मन पुण्यात्माओं द्वारा अनुमोदित आपकी आज्ञाओं के पालन में आकृष्ट होता है, उसी प्रकार बड़े-बड़े भोगों में भी अथवा अपनी प्रिय वस्तुओं में भी आकृष्ट नहीं होता; इसलिए मेरे प्रति आपके मन में जो शोक है, वह दूर हो जाए॥ 57॥
 
'Lord of the Earth! O sinless Maharaj! The way my mind is attracted towards following your orders approved by the virtuous, it is not attracted towards even the biggest pleasures or any of my favourite things; therefore the sorrow that you have in your mind for me should go away. ॥ 57॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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