श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 34: सीता और लक्ष्मण सहित श्रीराम का रानियों सहित राजा दशरथ के पास जाकर वनवास के लिये विदा माँगना, राजा का शोक और मूर्छा  »  श्लोक 55
 
 
श्लोक  2.34.55 
पुरं च राष्ट्रं च मही च केवला
मया विसृष्टा भरताय दीयताम्।
अहं निदेशं भवतोऽनुपालयन्
वनं गमिष्यामि चिराय सेवितुम्॥ ५५॥
 
 
अनुवाद
'मैंने यह नगर, यह राज्य और यह सारी पृथ्वी त्याग दी है। कृपया यह सब भरत को दे दीजिए। अब आपकी आज्ञा पाकर मैं यहाँ से दीर्घकाल तक वन में रहने के लिए प्रस्थान कर रहा हूँ।'
 
'I have left this city, this kingdom and this entire earth. Please give all this to Bharata. Now, following your orders, I am travelling from here to live in the forest for a long time.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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