श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 34: सीता और लक्ष्मण सहित श्रीराम का रानियों सहित राजा दशरथ के पास जाकर वनवास के लिये विदा माँगना, राजा का शोक और मूर्छा  »  श्लोक 54
 
 
श्लोक  2.34.54 
येन संस्तम्भनीयोऽयं सर्वो बाष्पकलो जन:।
स त्वं पुरुषशार्दूल किमर्थं विक्रियां गत:॥ ५४॥
 
 
अनुवाद
'पुरुषसिंह! यहाँ जो लोग आँसू बहा रहे हैं, उन सबका उत्साहवर्धन करना आपका कर्तव्य है; फिर आप स्वयं क्यों इतने व्याकुल हो रहे हैं?॥ 54॥
 
'Purushasingh! It is your duty to encourage all the people here who are shedding tears; then why are you yourself becoming so anxious?॥ 54॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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