श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 34: सीता और लक्ष्मण सहित श्रीराम का रानियों सहित राजा दशरथ के पास जाकर वनवास के लिये विदा माँगना, राजा का शोक और मूर्छा  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  2.34.5 
तं वर्धयित्वा राजानं पूर्वं सूतो जयाशिषा।
भयविक्लवया वाचा मन्दया श्लक्ष्णयाब्रवीत्॥ ५॥
 
 
अनुवाद
सर्वप्रथम सूत सुमन्त्र ने विजयसूचक आशीर्वाद देकर महाराज की समृद्धि की कामना की; तत्पश्चात् भय से व्याकुल होकर कोमल एवं मधुर वाणी में यह कहा- ॥5॥
 
First of all, Suta Sumantra gave blessings indicating victory and wished for the prosperity of the Maharaja; Then, distraught with fear, he said this in a soft and sweet voice - 5॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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