श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 34: सीता और लक्ष्मण सहित श्रीराम का रानियों सहित राजा दशरथ के पास जाकर वनवास के लिये विदा माँगना, राजा का शोक और मूर्छा  »  श्लोक 48
 
 
श्लोक  2.34.48 
त्वामहं सत्यमिच्छामि नानृतं पुरुषर्षभ।
प्रत्यक्षं तव सत्येन सुकृतेन च ते शपे॥ ४८॥
 
 
अनुवाद
'पुरुषशिरोमणि! यदि मेरे मन में कोई इच्छा है, तो वह यह है कि आप सत्यनिष्ठ रहें। आपका वचन मिथ्या न हो। मैं सत्य और सत्कर्म की शपथ लेकर आपके समक्ष यह बात कहता हूँ।' 48.
 
‘Purushashiromane! If I have any wish in my mind, it is that you should be truthful. Your word should not be false. I say this in front of you by taking an oath of truth and good deeds. 48.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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