श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 34: सीता और लक्ष्मण सहित श्रीराम का रानियों सहित राजा दशरथ के पास जाकर वनवास के लिये विदा माँगना, राजा का शोक और मूर्छा  »  श्लोक 46
 
 
श्लोक  2.34.46 
अपगच्छतु ते दु:खं मा भूर्बाष्पपरिप्लुत:।
नहि क्षुभ्यति दुर्धर्ष: समुद्र: सरितां पति:॥ ४६॥
 
 
अनुवाद
‘तुम्हारा दुःख दूर हो, इस प्रकार आँसू मत बहाओ। नदियों का स्वामी महासमुद्र व्याकुल नहीं होता - वह अपनी मर्यादा नहीं छोड़ता (उसी प्रकार तुम भी व्याकुल न होओ)।॥46॥
 
‘May your sorrow be removed, do not shed tears like this. The mighty ocean, the lord of rivers, is not agitated – it does not abandon its dignity (in the same way you should also not be agitated).॥ 46॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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