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श्लोक 2.34.38  |
न चैतदाश्चर्यतमं यत् त्वं ज्येष्ठ: सुतो मम।
अपानृतकथं पुत्र पितरं कर्तुमिच्छसि॥ ३८॥ |
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| अनुवाद |
| ‘पुत्र! तुम अपने पिता को सत्यवादी बनाना चाहते हो। इसमें तुम्हारे लिए विशेष आश्चर्य की बात नहीं है; क्योंकि गुण और आयु दोनों दृष्टि से तुम मेरे ज्येष्ठ पुत्र हो।’ ॥38॥ |
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| ‘Son! You want to make your father truthful. This is not a matter of much surprise for you; because you are my eldest son in terms of both qualities and age.' ॥ 38॥ |
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