श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 34: सीता और लक्ष्मण सहित श्रीराम का रानियों सहित राजा दशरथ के पास जाकर वनवास के लिये विदा माँगना, राजा का शोक और मूर्छा  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  2.34.35 
दुष्करं क्रियते पुत्र सर्वथा राघव प्रिय।
त्वया हि मत्प्रियार्थं तु वनमेवमुपाश्रितम्॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
'हे मेरे प्रिय पुत्र श्री राम! तुम बहुत कठिन कार्य कर रहे हो। मुझे प्रसन्न करने के लिए तुमने वन में शरण ली है।'
 
'My dear son Shri Ram! You are performing a very difficult task. You have taken refuge in the forest in order to please me. 35.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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