श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 34: सीता और लक्ष्मण सहित श्रीराम का रानियों सहित राजा दशरथ के पास जाकर वनवास के लिये विदा माँगना, राजा का शोक और मूर्छा  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  2.34.29 
नव पञ्च च वर्षाणि वनवासे विहृत्य ते।
पुन: पादौ ग्रहीष्यामि प्रतिज्ञान्ते नराधिप॥ २९॥
 
 
अनुवाद
'हे प्रभु! चौदह वर्ष तक वन में भ्रमण करने की अपनी प्रतिज्ञा पूरी करके मैं पुनः आपके चरणों में शीश झुकाऊँगा।'
 
'O Lord! After fulfilling my promise of roaming around in the forest for fourteen years, I will once again bow my head in front of your two feet.'
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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