श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 34: सीता और लक्ष्मण सहित श्रीराम का रानियों सहित राजा दशरथ के पास जाकर वनवास के लिये विदा माँगना, राजा का शोक और मूर्छा  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  2.34.26 
अहं राघव कैकेय्या वरदानेन मोहित:।
अयोध्यायां त्वमेवाद्य भव राजा निगृह्य माम्॥ २६॥
 
 
अनुवाद
'रघुनन्दन! मैं कैकेयी को दिए हुए वरदान से मोहित हो गया हूँ। मुझे कैद कर लो और स्वयं अयोध्या के राजा बन जाओ।'॥26॥
 
'Raghunandan! I am enamoured by the boon given to Kaikeyi. Imprison me and become the king of Ayodhya yourself.'॥ 26॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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