श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 33: सीता और लक्ष्मण सहित श्रीराम का दुःखी नगरवासियों के मुख से तरह की बातें सुनते हुए पिता के दर्शन के लिये कैकेयी के महल में जाना  »  श्लोक 26-27
 
 
श्लोक  2.33.26-27 
इत्येवं विविधा वाचो नानाजनसमीरिता:।
शुश्राव राघव: श्रुत्वा न विचक्रेऽस्य मानसम्॥ २६॥
स तु वेश्म पुनर्मातु: कैलासशिखरप्रभम्।
अभिचक्राम धर्मात्मा मत्तमातङ्गविक्रम:॥ २७॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार श्री रामचन्द्र जी ने बहुत से लोगों के मुख से नाना प्रकार की बातें सुनीं; परंतु सुनकर भी उनके मन में कोई विकार नहीं हुआ। मदमस्त गजराज के समान पराक्रमी धर्मात्मा श्री राम पुनः कैलाश शिखर के समान माता कैकेयी के श्वेत महल में गए॥26-27॥
 
In this way Shri Ramchandra ji heard different types of things coming from the mouths of many people; But even after listening there was no disturbance in his mind. Like the intoxicated Gajraj, the mighty virtuous Shri Ram again went to the white palace of Mother Kaikeyi, like the Kailash peak. 26-27॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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