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श्लोक 2.33.17  |
उद्यानानि परित्यज्य क्षेत्राणि च गृहाणि च।
एकदु:खसुखा राममनुगच्छाम धार्मिकम्॥ १७॥ |
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| अनुवाद |
| अपने सब बाग-बगीचे, घर-बार और खेत-खलिहान छोड़कर धर्मात्मा श्री राम का अनुसरण करो। उनके सुख-दुःख में उनके साथी बनो॥17॥ |
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| ‘Leave all your gardens, houses and farms and follow the virtuous Shri Ram. Become his companion in his joys and sorrows.॥ 17॥ |
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