श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 33: सीता और लक्ष्मण सहित श्रीराम का दुःखी नगरवासियों के मुख से तरह की बातें सुनते हुए पिता के दर्शन के लिये कैकेयी के महल में जाना  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  2.33.11 
निर्गुणस्यापि पुत्रस्य कथं स्याद् विनिवासनम्।
किं पुनर्यस्य लोकोऽयं जितो वृत्तेन केवलम्॥ ११॥
 
 
अनुवाद
'यदि पुत्र गुणहीन भी हो, तो उसे घर से निकालने का साहस कैसे किया जा सकता है? फिर उसे वनवास देने की बात कैसे की जा सकती है, जबकि उसका चरित्र ही समस्त संसार को मोहित कर सकता है?'
 
‘Even if the son is without qualities, how can one dare to throw him out of the house? Then how can one even talk of sending him into exile, if only his character can captivate the whole world?
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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