श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 32: लक्ष्मण सहित श्रीराम द्वारा ब्राह्मणों, ब्रह्मचारियों, सेवकों, त्रिजट ब्राह्मण और सुहृज्जनों को धन का वितरण  »  श्लोक 5-6h
 
 
श्लोक  2.32.5-6h 
जातरूपमयैर्मुख्यैरङ्गदै: कुण्डलै: शुभै:।
सहेमसूत्रैर्मणिभि: केयूरैर्वलयैरपि॥ ५॥
अन्यैश्च रत्नैर्बहुभि: काकुत्स्थ: प्रत्यपूजयत्।
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात ककुत्स्थकुलभूषण श्री राम ने सुवर्ण के बने हुए उत्तम अंगदों, सुन्दर कुण्डलों, सुवर्ण के धागे में पिरोए हुए रत्नों, केउरों, कुण्डलियों तथा अन्य अनेक रत्नों से उनकी पूजा की॥5 1/2॥
 
After that, Kakutsthakulbhushan Shri Ram worshiped him with the best Angads made of gold, beautiful earrings, gems threaded on golden thread, keurus, rings and many other gems. 5 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)