श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 32: लक्ष्मण सहित श्रीराम द्वारा ब्राह्मणों, ब्रह्मचारियों, सेवकों, त्रिजट ब्राह्मण और सुहृज्जनों को धन का वितरण  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  2.32.45 
द्विज: सुहृद् भृत्यजनोऽथवा तदा
दरिद्रभिक्षाचरणश्च यो भवेत्।
न तत्र कश्चिन्न बभूव तर्पितो
यथार्हसम्माननदानसम्भ्रमै:॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
उस समय ऐसा एक भी ब्राह्मण, मित्र, सेवक, दरिद्र या भिखारी नहीं था जो श्री रामजी के आदर, दान और आतिथ्य से संतुष्ट न हुआ हो ॥45॥
 
At that time there was not a single Brahmin, friend, servant, poor person or beggar who was not satisfied with the due respect, charity and hospitality of Shri Ram. ॥ 45॥
 
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे द्वात्रिंश: सर्ग:॥ ३२॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें बत्तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३२॥
 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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