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ramayan 2.32.34-35h: उस समय त्रिजटा श्री राम के पास गई और बोली, 'हे पराक्रमी राजकुमार! मैं दरिद्र हूँ। मेरे अनेक पुत्र हैं। मेरी आजीविका छिन गई है, इसलिए मैं सदैव वन में रहती हूँ। कृपया मुझ पर दया करें।'   |   ramayan सर्ग 2.32: लक्ष्मण सहित श्रीराम द्वारा ब्राह्मणों, ब्रह्मचारियों, सेवकों, त्रिजट ब्राह्मण और सुहृज्जनों को धन का वितरण   ।   ramayan काण्ड 2: अयोध्या काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 32: लक्ष्मण सहित श्रीराम द्वारा ब्राह्मणों, ब्रह्मचारियों, सेवकों, त्रिजट ब्राह्मण और सुहृज्जनों को धन का वितरण  »  श्लोक 34-35h
 
 
श्लोक  2.32.34-35h 
स राममासाद्य तदा त्रिजटो वाक्यमब्रवीत्।
निर्धनो बहुपुत्रोऽस्मि राजपुत्र महाबल॥ ३४॥
क्षतवृत्तिर्वने नित्यं प्रत्यवेक्षस्व मामिति।
 
 
अनुवाद
उस समय त्रिजटा श्री राम के पास गई और बोली, 'हे पराक्रमी राजकुमार! मैं दरिद्र हूँ। मेरे अनेक पुत्र हैं। मेरी आजीविका छिन गई है, इसलिए मैं सदैव वन में रहती हूँ। कृपया मुझ पर दया करें।'
 
At that time, Trijata went to Shri Ram and said, 'O mighty prince! I am poor. I have many sons. I have lost my livelihood and hence I always live in the forest. Please have mercy on me.'
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)