| श्रीमद् वाल्मीकि रामायण » काण्ड 2: अयोध्या काण्ड » सर्ग 32: लक्ष्मण सहित श्रीराम द्वारा ब्राह्मणों, ब्रह्मचारियों, सेवकों, त्रिजट ब्राह्मण और सुहृज्जनों को धन का वितरण » श्लोक 30-31 |
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| | | | श्लोक 2.32.30-31  | तं वृद्धं तरुणी भार्या बालानादाय दारकान्।
अब्रवीद् ब्राह्मणं वाक्यं स्त्रीणां भर्ता हि देवता॥ ३०॥
अपास्य फालं कुद्दालं कुरुष्व वचनं मम।
रामं दर्शय धर्मज्ञं यदि किंचिदवाप्स्यसि॥ ३१॥ | | | | | | अनुवाद | | वह स्वयं तो वृद्ध हो गया था, परन्तु उसकी पत्नी अभी भी जवान थी। उसने अपने छोटे-छोटे बच्चों को साथ लेकर ब्राह्मण देवता से यह कहा - 'हे प्रिये! यद्यपि स्त्रियों के लिए पति ही देवता है, (अतः मुझे तुम्हें आदेश देने का कोई अधिकार नहीं है, फिर भी मैं तुम्हारी भक्त हूँ; अतः मैं तुमसे विनम्र प्रार्थना करती हूँ कि -) इस हल और कुदाल को फेंक दो और जो मैं कहूँ, वही करो। धर्मज्ञ श्री रामचन्द्रजी से मिलो। यदि तुम ऐसा करोगे, तो वहाँ तुम्हें अवश्य कुछ प्राप्त होगा।'॥30-31॥ | | | | He himself had become old, but his wife was still young. Taking along her young children, she said this to the Brahmin God - 'My dear one! (Although) for women, the husband is the god, (therefore I have no right to order you, yet I am your devotee; therefore I humbly request you that -) throw away this ploughshare and hoe and do what I say. Meet the Dharma-knower Shri Ramchandraji. If you do this, you will surely get something there.'॥ 30-31॥ | | ✨ ai-generated | | |
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