श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 32: लक्ष्मण सहित श्रीराम द्वारा ब्राह्मणों, ब्रह्मचारियों, सेवकों, त्रिजट ब्राह्मण और सुहृज्जनों को धन का वितरण  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  2.32.29 
तत्रासीत् पिङ्गलो गार्ग्यस्त्रिजटो नाम वै द्विज:।
क्षतवृत्तिर्वने नित्यं फालकुद्दाललाङ्गली॥ २९॥
 
 
अनुवाद
उन्हीं दिनों अयोध्या के निकट वन में त्रिजट नामक गर्ग गोत्र का एक ब्राह्मण रहता था। उसके पास जीविका का कोई साधन नहीं था, अतः व्रत आदि के कारण उसका रंग पीला पड़ गया था। वह सदैव हल, कुदाल और दरांती लेकर फल-मूल की खोज में वन में घूमता रहता था।
 
In those days, a Brahmin of Garg gotra named Trijat lived in the forest near Ayodhya. He had no means of livelihood, so his complexion had turned pale due to fasting etc. He always used to roam in the forest with a plough, hoe and a sickle in search of fruits and roots.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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