श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 32: लक्ष्मण सहित श्रीराम द्वारा ब्राह्मणों, ब्रह्मचारियों, सेवकों, त्रिजट ब्राह्मण और सुहृज्जनों को धन का वितरण  »  श्लोक 18-20
 
 
श्लोक  2.32.18-20 
ये चेमे कठकालापा बहवो दण्डमाणवा:॥ १८॥
नित्यस्वाध्यायशीलत्वान्नान्यत् कुर्वन्ति किंचन।
अलसा: स्वादुकामाश्च महतां चापि सम्मता:॥ १९॥
तेषामशीतियानानि रत्नपूर्णानि दापय।
शालिवाहसहस्रं च द्वे शते भद्रकांस्तथा॥ २०॥
 
 
अनुवाद
'मेरे सम्बन्धी बहुत से ब्रह्मचारी, जो कथा शाखा और कलाप शाखा का अध्ययन करते हैं और दंड धारण करते हैं, वे सदैव स्वाध्याय में लगे रहने के कारण अन्य कोई कार्य नहीं कर पाते। वे भिक्षा मांगने में आलसी हैं, किन्तु स्वादिष्ट भोजन की इच्छा रखते हैं। महापुरुष भी उनका आदर करते हैं। उनके लिए रत्नों से लदे अस्सी ऊँट, अघनै चावल के भार से लदे एक हजार बैल और भद्रक नामक एक विशेष अन्न (चना, मूंग आदि) के भार से लदे दो सौ बैल ले आओ।'
 
‘Many Brahmacharis who are related to me and study the Katha branch and Kalapa branch and hold a stick, are unable to do any other work because they are always engaged in self-study. They are lazy in begging, but they wish to eat delicious food. Even great men respect them. Get for them eighty camels laden with gems, a thousand bulls carrying the load of Aghanai rice and two hundred bulls carrying the load of a special grain called Bhadrak (gram, green gram etc.).
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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