श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 32: लक्ष्मण सहित श्रीराम द्वारा ब्राह्मणों, ब्रह्मचारियों, सेवकों, त्रिजट ब्राह्मण और सुहृज्जनों को धन का वितरण  »  श्लोक 15-16
 
 
श्लोक  2.32.15-16 
कौसल्यां च य आशीर्भिर्भक्त: पर्युपतिष्ठति।
आचार्यस्तैत्तिरीयाणामभिरूपश्च वेदवित्॥ १५॥
तस्य यानं च दासीश्च सौमित्रे सम्प्रदापय।
कौशेयानि च वस्त्राणि यावत् तुष्यति स द्विज:॥ १६॥
 
 
अनुवाद
लक्ष्मण! जो यजुर्वेद की तैत्तिरीय शाखा का अध्ययन करने वाले ब्राह्मणों के गुरु हैं, जो सम्पूर्ण वेदों के ज्ञाता हैं, जो दान कमाने में भी समर्थ हैं तथा जो माता कौशल्या के प्रति भक्तिभाव रखते हुए प्रतिदिन उनके दर्शन करके उन्हें आशीर्वाद देते हैं, उन्हें वाहन, सेवक, रेशमी वस्त्र तथा राजकोष से उतना धन प्रदान करें, जितना ब्राह्मण देवता को संतुष्ट कर सके।
 
Lakshmana! Those who are the teachers of the Brahmins who study the Taittiriya branch of the Yajurveda and who are learned in all the Vedas, who also have the capability of earning gifts and who, with devotion towards mother Kausalya, visit her daily and bless her, provide them with vehicles, servants, silken clothes and as much wealth from the treasury as would satisfy the Brahmin god.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)