श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 32: लक्ष्मण सहित श्रीराम द्वारा ब्राह्मणों, ब्रह्मचारियों, सेवकों, त्रिजट ब्राह्मण और सुहृज्जनों को धन का वितरण  »  श्लोक 13-14
 
 
श्लोक  2.32.13-14 
अगस्त्यं कौशिकं चैव तावुभौ ब्राह्मणोत्तमौ।
अर्चयाहूय सौमित्रे रत्नै: सस्यमिवाम्बुभि:॥ १३॥
तर्पयस्व महाबाहो गोसहस्रेण राघव।
सुवर्णरजतैश्चैव मणिभिश्च महाधनै:॥ १४॥
 
 
अनुवाद
सुमित्रानन्दन! अगस्त्य और विश्वामित्र, दोनों श्रेष्ठ ब्राह्मणों को बुलाकर रत्नों से उनकी पूजा करो। महाबाहु रघुनन्दन! जैसे मेघ अपनी वर्षा से फसलों को तृप्त करते हैं, वैसे ही तुम सहस्त्रों गौओं, स्वर्णमुद्राओं, चाँदी और बहुमूल्य रत्नों से उन्हें तृप्त करो॥13-14॥
 
‘Sumitranandan! Call Agastya and Vishwamitra, both excellent Brahmins, and worship them with gems. Mighty-armed Raghunandan! Just as the clouds satiate the crops with their rain, similarly you satiate them with thousands of cows, gold coins, silver and precious gems.॥ 13-14॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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