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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण
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काण्ड 2: अयोध्या काण्ड
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सर्ग 30: सीता का वन में चलने के लिये अधिकआग्रह, विलाप और घबराहट देखकर श्रीराम का उन्हें साथ ले चलने की स्वीकृति देना
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श्लोक 15
श्लोक
2.30.15
पत्रं मूलं फलं यत्तु अल्पं वा यदि वा बहु।
दास्यसे स्वयमाहृत्य तन्मेऽमृतरसोपमम्॥ १५॥
अनुवाद
‘तुम अपने हाथों से जो कुछ भी लाओगी, चाहे वह थोड़ा हो या बहुत फल, चाहे जड़ हो या पत्ता, वह मेरे लिए अमृत के समान होगा ॥ 15॥
‘Whatever you bring with your own hands, be it a little or much fruit, a root or a leaf, it will be like nectar to me.॥ 15॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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