श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 3: राज्याभिषेक की तैयारी , राजा दशरथ का श्रीराम को राजनीति की बातें बताना  »  श्लोक 44-45
 
 
श्लोक  2.3.44-45 
अमात्यप्रभृती: सर्वा: प्रजाश्चैवानुरञ्जय।
कोष्ठागारायुधागारै: कृत्वा संनिचयान् बहून्॥ ४४॥
इष्टानुरक्तप्रकृतिर्य: पालयति मेदिनीम्।
तस्य नन्दन्ति मित्राणि लब्ध्वामृतमिवामरा:॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
‘मंत्री, सेनापति आदि समस्त अधिकारियों और प्रजा को सदैव प्रसन्न रखो। जो राजा भण्डार और शस्त्रागार आदि में बहुत-सी उपयोगी वस्तुओं का संग्रह करता है और मंत्री, सेनापति, प्रजा आदि समस्त प्रकृति को प्रिय बनाकर, उन्हें अपने में अनुरक्त और प्रसन्न रखकर पृथ्वी का पालन करता है, उसके मित्र उसी प्रकार प्रसन्न रहते हैं, जैसे अमृत पाकर देवता प्रसन्न हुए थे॥ 44-45॥
 
‘Keep all the officials like the minister, the commander, etc. and the subjects always happy. The king who collects a lot of useful things in storehouses and armory etc. and takes care of the earth by keeping all the nature like the minister, commander, subjects etc. dear to him and keeping them attached to him and happy, his friends are happy in the same way as the gods were happy after getting nectar.॥ 44-45॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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