श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 3: राज्याभिषेक की तैयारी , राजा दशरथ का श्रीराम को राजनीति की बातें बताना  »  श्लोक 39-41h
 
 
श्लोक  2.3.39-41h 
ज्येष्ठायामसि मे पत्न्यां सदृश्यां सदृश: सुत:॥ ३९॥
उत्पन्नस्त्वं गुणज्येष्ठो मम रामात्मज: प्रिय:।
त्वया यत: प्रजाश्चेमा: स्वगुणैरनुरञ्जिता:॥ ४०॥
तस्मात् त्वं पुष्ययोगेन यौवराज्यमवाप्नुहि।
 
 
अनुवाद
'पुत्र! तुम मेरी बड़ी रानी कौशल्या के गर्भ से उत्पन्न हुए हो। तुम अपनी माता के समान ही उत्पन्न हुए हो। श्री राम! तुम गुणों में मुझसे श्रेष्ठ हो, अतः मेरे परम प्रिय पुत्र हो; तुमने अपने गुणों से इन समस्त प्रजा को प्रसन्न किया है, अतः कल पुष्यनक्षत्र के अवसर पर युवराज पद ग्रहण करो।'
 
‘Son! You were born from the womb of my elder queen Kausalya. You were born just like your mother. Shri Ram! You are superior to me in virtues, therefore you are my most beloved son; you have pleased all these subjects with your virtues, therefore tomorrow on the occasion of Pushyanakshatra, accept the position of crown prince. 39-40 1/2.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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