श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 3: राज्याभिषेक की तैयारी , राजा दशरथ का श्रीराम को राजनीति की बातें बताना  »  श्लोक 28-29
 
 
श्लोक  2.3.28-29 
दीर्घबाहुं महासत्त्वं मत्तमातङ्गगामिनम्।
चन्द्रकान्ताननं राममतीव प्रियदर्शनम्॥ २८॥
रूपौदार्यगुणै: पुंसां दृष्टिचित्तापहारिणम्।
घर्माभितप्ता: पर्जन्यं ह्लादयन्तमिव प्रजा:॥ २९॥
 
 
अनुवाद
उनकी भुजाएँ बड़ी थीं और उनका बल महान था। वे मतवाले हाथी के समान बड़े आनन्द से चल रहे थे। उनका मुख चन्द्रमा से भी अधिक तेजस्वी था। सभी लोग श्री राम के दर्शन करना चाहते थे। वे अपनी सुन्दरता, उदारता आदि से लोगों के नेत्रों और मन को मोह लेते थे। जिस प्रकार बादल सूर्य से तपते हुए प्राणियों को सुख प्रदान करते हैं, उसी प्रकार वे समस्त लोगों को अपार सुख प्रदान करते थे।
 
His arms were large and his strength was great. He was walking with great joy like a drunken elephant. His face was more radiant than the moon. Everyone loved to see Shri Ram. He used to attract the eyes and minds of people with his beauty and generosity etc. Just as clouds provide happiness to the creatures scorched by the sun, in the same way he used to give immense happiness to all the people.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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