| श्रीमद् वाल्मीकि रामायण » काण्ड 2: अयोध्या काण्ड » सर्ग 29: सीता का श्रीराम के समक्ष उनके साथ अपने वनगमन का औचित्य बताना » श्लोक 20 |
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| | | | श्लोक 2.29.20  | भक्तां पतिव्रतां दीनां मां समां सुखदु:खयो:।
नेतुमर्हसि काकुत्स्थ समानसुखदु:खिनीम्॥ २०॥ | | | | | | अनुवाद | | 'ककुत्स्थकुलभूषण! मैं आपका भक्त हूँ, सतीत्व व्रत का पालन करता हूँ, आपके वियोग के भय से दुःखी हो रहा हूँ और आपके सुख-दुःख में समान रूप से भागी रहूँगा। चाहे सुख मिले या दुःख, मैं दोनों ही अवस्थाओं में एक-सा रहूँगा - न सुख से न दुःख से अभिभूत होऊँगा। अतः आप मुझे अपने साथ ले चलें॥ 20॥ | | | | ‘Kakutsthakulbhushan! I am your devotee, I follow the vow of chastity, I am suffering due to the fear of separation from you and I will share your joys and sorrows equally. Whether I get happiness or sorrow, I will remain the same in both situations – I will not be overcome by joy or sorrow. Therefore, please take me along with you.॥ 20॥ | | ✨ ai-generated | | |
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