श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 29: सीता का श्रीराम के समक्ष उनके साथ अपने वनगमन का औचित्य बताना  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  2.29.12 
वनवासे हि जानामि दु:खानि बहुधा किल।
प्राप्यन्ते नियतं वीर पुरुषैरकृतात्मभि:॥ १२॥
 
 
अनुवाद
वीर! मैं जानता हूँ कि वनवास में अवश्य ही बहुत दुःख भोगने पड़ते हैं; परन्तु वे दुःख उन्हीं को प्रतीत होते हैं जिनकी इन्द्रियाँ और मन उनके वश में नहीं हैं॥12॥
 
'Veer! I know that in exile one surely has to suffer a lot; but they seem like sufferings only to those whose senses and mind are not under their control.॥ 12॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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