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श्लोक 2.28.8  |
क्रीडमानाश्च विस्रब्धा मत्ता: शून्ये तथा मृगा:।
दृष्ट्वा समभिवर्तन्ते सीते दु:खमतो वनम्॥ ८॥ |
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| अनुवाद |
| हे सीता! निर्जन वन में निर्भय होकर विचरण करने वाले जंगली पशु, मनुष्य को देखते ही चारों ओर से उस पर टूट पड़ते हैं; इसीलिए यह वन दुःखों से भरा हुआ है। |
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| Sita! The wild animals which play fearlessly in the deserted forest, rush upon a human being from all sides as soon as they see him; hence the forest is full of misery. |
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