|
| |
| |
श्लोक 2.28.17  |
यथालब्धेन कर्तव्य: संतोषस्तेन मैथिलि।
यताहारैर्वनचरै: सीते दु:खमतो वनम्॥ १७॥ |
| |
| |
| अनुवाद |
| ‘मिथिलेशकुमारी जानकी! वनवासियों को जो भी भोजन मिल जाए, उसी से संतुष्ट रहना पड़ता है; इसलिए वन दुःख से भरा हुआ है॥ 17॥ |
| |
| ‘Mithilesh Kumari Janaki! Forest dwellers have to be satisfied with whatever food they get; hence the forest is full of sorrow.॥ 17॥ |
| ✨ ai-generated |
| |
|