श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 28: श्रीराम का वनवास के कष्ट का वर्णन करते हुए सीता को वहाँ चलने से मना करना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  2.28.17 
यथालब्धेन कर्तव्य: संतोषस्तेन मैथिलि।
यताहारैर्वनचरै: सीते दु:खमतो वनम्॥ १७॥
 
 
अनुवाद
‘मिथिलेशकुमारी जानकी! वनवासियों को जो भी भोजन मिल जाए, उसी से संतुष्ट रहना पड़ता है; इसलिए वन दुःख से भरा हुआ है॥ 17॥
 
‘Mithilesh Kumari Janaki! Forest dwellers have to be satisfied with whatever food they get; hence the forest is full of sorrow.॥ 17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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