श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 28: श्रीराम का वनवास के कष्ट का वर्णन करते हुए सीता को वहाँ चलने से मना करना  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  2.28.16 
उपहारश्च कर्तव्य: कुसुमै: स्वयमाहृतै:।
आर्षेण विधिना वेद्यां सीते दु:खमतो वनम्॥ १६॥
 
 
अनुवाद
'सीते! वहाँ स्वयं लाए हुए पुष्पों से वैदिक रीति से वेदी पर देवताओं का पूजन करना पड़ता है। इसीलिए उस वन को कष्टदायक कहा गया है॥16॥
 
‘Sita! There one has to worship the deities on the altar as per the Vedic rituals using flowers brought by oneself. That is why the forest is said to be troublesome.॥ 16॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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